Friday, 7 January 2022

Shishir Ritucharya/ शिशिर ऋतुचर्या

 शिशिर ऋतुचर्या



इस संसार में वर्ष रुपी काल को छः ऋतुओं में विभाजित किया गया है। भारत वर्ष की यह खूबी है कि यहाँ हमें आयुर्वेद में वर्णित सभी 6 ऋतुओं का सम्यक ज्ञान होता है -शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद एवं हेमंत।

हेमंत ऋतु के पश्चात शिशिर ऋतु का आगमन होता है। लोक चाल कि भाषा में कहें तो शिशिर ऋतु को पतझड़ एवं सर्दी के नाम से जाना जाता है। सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण का हो जाते हैं, अर्थात विसर्ग काल का अंत और आदान काल का प्रारंभ हो जाता है। आयुर्वेद मतानुसार इस ऋतु में कफ दोष का संचय होता है, अग्नि तीव्र होती है तथा मनुष्य का शारीरिक बल श्रेष्ठ होता है।

लक्षण-

उत्तर दिशा से ठण्डी वायु चलती है। मेघ, रूक्ष वायु व वर्षा के कारण अधिक शीत व रूक्षता होती है। जलाशयों में बर्फ तथा नदियों में वाष्प निकलती दिखायी पड़ती है। लोघ्र, प्रियांशु, नागकेशर आदि के खिले सुन्दर पुष्प दिखायी पड़ते हैं। यदा कदा वर्षा भी देखी जा सकती है।

समय- 

संवत्सर में माघादि बारह मास होते हैं। दो-दो मास की एक ऋतु मानी जाती है। इस तरह एक वर्ष में  6 ऋतुएँ बनती हैं। माघ एवं फाल्गुन मास (मध्य जनवरी से मध्य मार्च) में शिशिर ऋतु बनती है।

संभावित रोग – 

वातिक व वात-कफज रोग यथा-ज्वर (सर्दी-बुखार) कास (खांसी), श्वास पक्षाधात, अर्दित, प्रतिश्याय (जुखाम), पैर में बिवाई फटना, दमा, त्वचा में रूखापन होना आदि।

पथ्य कर आहार-विहार-

शिशिर ऋतु में मनुष्यों की जठराग्नि प्रबल रहती है। यदि अग्नि बल के अनुसार अन्न न किया जाए तो अग्नि शरीर के सौम्य भाग को नष्ट करने लगती है। इसलिए शीत काल के शीत गुण के बढ़ने से वायु बढती है। इस वायु वृस्शी को रोकने हेतु-

अग्नि के तीव्र होने के कारण मधुर, अम्ल, लवण रसोयुक्त- गुरू व स्निग्ध आहार का सेवन करना चाहिए। विविध प्रकार के मेवों से बने पकवान , मेवा मिश्रित लड्डू, तिल, घृत, तेल, सैन्धव लवण, मूंगदाल, अदरक, लहसुन, प्याज, गर्म दूध, तेल अभ्यंग, ऊनी एवं गर्म वस्त्र पहनना आदि। औदक (मछली), आनूप (सुअर) आदि मेदस्वी जीवो का मांस रस तथा प्रसह (कौआ) विलेशय (गोधा) आदि पक्षियों का मांस भूनकर खाना चाहिए। दुग्ध विकार (दुग्ध, खोया, पनीर, मिठाईयाँ); इक्षु विकार (गुड़, चीनी, राव); नवीन धान्य (गेहूँ, चावल); नवीन मद्य (मदिरा, सीधु); वसा; तेल; उष्ण जल आदि का सेवन करना चाहिए। स्वस्थ नारी के साथ इच्छानुसार मैथुन किया जा सकता है।



अपथ्यकर आहार-विहार–

अधिक तले भुने खाद्य पदार्थ, वातकारकभोजन, शीत पेय पदार्थ, वर्षा में भीगना आदि/कटु, तिक्त कषाय रसो युक्त, वातल, लघु, शीतल अन्नपान व अल्पाहार का सेवन नहीं करना चाहिए। इस ऋतु में बच्चों को श्वास (निमोनिया) होने की सम्भावना होती है। यदि बच्चे की साँस तेज चलने की शिकायत हो तो तुरंत वैद्यकीय सलाह लें। इस मौसम में बाहरी खान पान, फ़ास्ट फ़ूड, जंक फ़ूड, ब्रेड, टोस्ट, चिप्स, चोकोलेट, आइसक्रीम, कोल्डड्रिंक आदि बच्चों को कम खाने दें। इस ऋतु में फंगल इन्फेक्शन का प्रकोप भी खूब तेजी से फैलता है, इससे बचाव हेतु शरीर के अंगों को सूखा एवं स्वच्छ रखें। बासी भोजन करने से बचें। सदा ताज़ा बना गर्म भोजन करें।

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